देहरादून। उत्तराखंड में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने आगामी 2027 विधानसभा चुनावों को देखते हुए एक अहम संगठनात्मक निर्णय लिया है। पार्टी ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि राज्य सरकार में विभिन्न सरकारी पदों पर नियुक्त पदाधिकारियों को विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं दिया जाएगा। इस फैसले ने संगठन के भीतर नई राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है और कई संभावित दावेदारों की योजनाओं पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।
पार्टी ने हाल ही में करीब 50 पदाधिकारियों को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी हैं। लेकिन नई व्यवस्था के तहत सरकारी दायित्व संभालने वाले नेताओं को चुनाव लड़ने के बजाय संगठनात्मक मजबूती और प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित करने की भूमिका दी जाएगी। इससे उन नेताओं के सामने असमंजस की स्थिति बन गई है, जो अब तक सरकारी पद और विधानसभा टिकट—दोनों संभावनाओं पर विचार कर रहे थे।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि टिकट वितरण का अंतिम निर्णय केंद्रीय संसदीय बोर्ड द्वारा लिया जाता है। हालांकि, सैद्धांतिक रूप से यह तय किया गया है कि सरकारी पदों पर तैनात व्यक्ति चुनाव मैदान में उतरने के बजाय उम्मीदवारों के समर्थन और चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी निभाएंगे। उनके अनुसार, संगठनात्मक अनुशासन और चुनावी रणनीति को मजबूत करने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया है।
सूत्रों के मुताबिक, राज्य प्रशासन में दो दर्जन से अधिक पद अभी रिक्त हैं, जिनके लिए सैकड़ों कार्यकर्ता प्रयासरत हैं। नियुक्तियों में देरी के चलते पहले से ही अटकलों का दौर जारी था। अब पार्टी द्वारा लागू की गई नई शर्त ने इन अटकलों को और हवा दे दी है। माना जा रहा है कि यह कदम संगठन के भीतर बढ़ते दबाव को संतुलित करने और संभावित असंतोष को नियंत्रित करने की रणनीति का हिस्सा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला पार्टी में स्पष्ट संदेश देता है कि संगठन और सरकार की भूमिकाएं अलग-अलग रखी जाएंगी। इससे एक ओर जहां चुनावी प्रबंधन पर फोकस बढ़ेगा, वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश भी लगेगा। हालांकि, जिन पदाधिकारियों की नजर 2027 के चुनाव पर थी, उनके लिए यह निर्णय चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।
फिलहाल पार्टी के भीतर इस विषय पर मंथन जारी है। आने वाले महीनों में नियुक्तियों और टिकट वितरण की प्रक्रिया किस दिशा में जाती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।



