देहरादून में साइबर अपराधियों ने दो सेवानिवृत्त वरिष्ठ नागरिकों से डिजिटल अरेस्ट और निवेश के झांसे में फंसाकर कुल 1.20 करोड़ रुपये की ठगी की। जल निगम से सेवानिवृत्त मंगल सिंह रावत ने डिजिटल अरेस्ट के डर से 64.65 लाख गंवाए,
जबकि हिंदुस्तान नेशनल ग्लास लिमिटेड के राजीव साहनी ने निवेश धोखाधड़ी में 55.48 लाख रुपये खो दिए। साइबर क्राइम पुलिस ने दोनों मामलों में मुकदमा दर्ज कर लिया है।
देहरादून। राजधानी देहरादून में साइबर अपराधियों ने डिजिटल अरेस्ट और निवेश के झांसे को हथियार बनाकर विभिन्न विभागों से सेवानिवृत्त दो वरिष्ठ नागरिकों से कुल 1.20 करोड़ रुपये की ठगी कर दी।
दोनों ही पीड़ित बुजुर्ग आनलाइन ठगी के जाल से अनजान थे और अपराधियों की बातों में फंसकर अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी गंवा बैठे। दोनों मामलों में साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन ने मुकदमा दर्ज कर लिया है।
अजबपुर कलां निवासी मंगल सिंह रावत जल निगम से सेवानिवृत्त हैं। 21 नवंबर 2025 को उन्हें एक धमकी भरा फोन आया। काल करने वाले ने खुद को दिल्ली पुलिस का अधिकारी बताते हुए कहा कि उनके विरुद्ध धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज है।
उसने एक अन्य नंबर दिया और बताया कि यह नंबर दिल्ली पुलिस का है और एनओसी न लेने पर आधार व पैनकार्ड सीज कर दिए जाएंगे। जब पीड़ित ने उस नंबर पर बात की तो कालर ने खुद को सीबीआइ दिल्ली का अधिकारी बताया।
उसने कहा कि बाराखंभा स्थित एक बैंक खाते से मंगल सिंह के नाम पर मनीलांड्रिंग हो रही है और एक व्यक्ति गिरफ्तार भी हो चुका है। इसके बाद अपराधी लगातार संपर्क में रहे और 10 दिसंबर को पीड़ित को बताया कि उन्हें ‘डिजिटल अरेस्ट’ किया गया है।
गिरफ्तारी के भय से रावत ने साइबर ठगों के धमकाने पर 64.65 लाख रुपये अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर दिए। बाद में जब परिवार के सदस्यों को जानकारी मिली तो मामला साइबर पुलिस तक पहुंचा।
इसी तरह गोविंद नगर, ऋषिकेश निवासी राजीव साहनी हिंदुस्तान नेशनल ग्लास लिमिटेड से सेवानिवृत्त हैं। 11 दिसंबर 2025 को उन्हें वाट्सएप काल पर यतिन शाह नाम के व्यक्ति ने संपर्क किया और खुद को आइआइएफएल वेल्थ मैनेजमेंट का सीईओ बताया।
विश्वास जीतने के बाद उसने 16 दिसंबर 2025 से 28 जनवरी 2026 के बीच साहनी को शेयर मार्केट में निवेश करने के लिए प्रेरित किया।
आरोपितों के झांसे में आकर पीड़ित ने अलग-अलग खातों में कुल 55.48 लाख रुपये भेज दिए। जब उन्होंने निवेश की राशि निकालने की कोशिश की तो अपराधियों ने 25 लाख रुपये और जमा करने का दबाव बनाया। तब उन्हें एहसास हुआ कि वे साइबर ठगी का शिकार हो चुके हैं।
13 माह में 93 मुकदमे दर्ज
वर्ष 2025 में साइबर अपराध के 92 मुकदमे दर्ज हुए, जिसमें 10 डिजिटल अरेस्ट के हैं। वर्ष 2026 में एक माह में 11 साइबर अपराध के मुकदमे दर्ज हो चुके हैं, जिनमें पांच डिजिटल अरेस्ट के हैं। डिजिटल अरेस्ट के शिकार ज्यादातर अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिक हो रहे हैं।
साइबर ठगी व डिजिटल अरेस्ट से बचाव के टिप्स
- अज्ञात काल पर विश्वास न करें। खुद को पुलिस, सीबीआइ, बैंक या कस्टम बताने वाली काल 99 प्रतिशत फर्जी होती हैं।
- ओटीपी, यूपीआइ पिन, बैंक विवरण किसी से साझा न करें। असली अधिकारी या बैंक कभी यह जानकारी नहीं मांगते।
- संदिग्ध लिंक पर क्लिक न करें। ‘केवाइसी अपडेट’, ‘पार्सल अटका’, ‘पैसे दोगुने’ जैसे मैसेज अधिकतर ठगी के होते हैं।
- स्क्रीन शेयरिंग एप (ऐनीडेस्क, टीम व्यूवर आदि) इंस्टाल न करें। एक बार स्क्रीन शेयर की तो पूरा खाते का नियंत्रण ठग के पास चला जाता है।
- यूपीआइ पर ‘कलेक्ट रिक्वेस्ट’ या अनजान क्यूआर स्कैन न करें।
- ठगी का संदेह हो तो तुरंत 1930 पर काल करें और cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें। पहले 30 मिनट बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।



