देहरादून। सुभाष नगर स्थित श्री सत्य साईं मंदिर परिसर में आयोजित एक विशेष आध्यात्मिक गोष्ठी में भगवद्गीता के संदेशों की गूंज सुनाई दी। “भगवद्गीता: एक परिचय” विषय पर आयोजित इस व्याख्यान में मुख्य वक्ता कर्नल आर. डी. नौटियाल ने गीता के गूढ़ रहस्यों को अत्यंत सरल और प्रेरक ढंग से प्रस्तुत किया। उनके विचारों से पूरा मंदिर परिसर आध्यात्मिक चेतना से सराबोर हो उठा।
जीवन के संघर्षों में मार्गदर्शक है गीता
अपने संबोधन में कर्नल नौटियाल ने कहा कि आज के तनावपूर्ण और प्रतिस्पर्धात्मक युग में गीता के सिद्धांत पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि गीता केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। यह मनुष्य को मानसिक संतुलन, आत्मविश्वास और सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान करती है।
श्रीमद्भागवत और गीता का अंतर स्पष्ट किया
व्याख्यान की मुख्य विशेषता कर्नल नौटियाल द्वारा श्रीमद्भागवत और भगवद्गीता के बीच के अंतर को स्पष्ट करना रही। उन्होंने बताया:
श्रीमद्भागवत: यह भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, उनकी दिव्य भक्ति और चरित्र का विस्तार है।
भगवद्गीता: यह कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में अर्जुन को दिया गया वह उपदेश है, जो संघर्ष के बीच कर्तव्य, धर्म और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाता है।
त्रिवेणी: कर्म, भक्ति और ज्ञान योग
कर्नल नौटियाल ने गीता के तीन प्रमुख स्तंभों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जीवन में संतुलन कैसे लाया जाए:
कर्मयोग: फल की चिंता किए बिना निस्वार्थ भाव से कर्तव्य पालन की प्रेरणा देता है।
भक्तियोग: ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और अटूट आस्था सिखाता है।
ज्ञानयोग: विवेक, आत्मबोध और परम सत्य की अनुभूति की ओर ले जाता है।
उन्होंने कहा कि इन तीनों मार्गों का समन्वय ही व्यक्ति के भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाता है, जिससे समाज में नैतिक मूल्यों और सद्भाव को बढ़ावा मिलता है।




