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चुनावी में राजकोषीय संतुलन ताक पर रख देते हैं राज्य, ‘मुफ्त की रेवड़ियां’ खराब कर रही राज्यों की वित्तीय स्थिति…

कोरोना महामारी के बाद केंद्र सरकार के साथ ही राज्यों में भी राजकोषीय संतुलन (Maharashtra Elections) स्थापित करने की अच्छी कोशिश चल रही थी। चालू वित्त वर्ष के दौरान केंद्र की चाल तो सही दिशा में बढ़ रही है लेकिन कई राज्यों की स्थिति ठीक नहीं दिखती। इसकी बड़ी वजह लोकलुभावन वादे और उन पर अमल करना है। ये बातें देश की आर्थिक शोध एजेंसी एमके ग्लोबल की मंगलवार को जारी रिपोर्ट में बताई गई है।

पिछले दो वर्षों में देश के 10 राज्यों में चुनाव हुए। इन राज्यों में लोक-लुभावन वादे किए गए हैं जिनका अमल इन राज्यों के वित्तीय स्वास्थ्य पर बोझ डालेगा। कई राज्य ऐसे हैं जो अपने राजस्व संग्रह को लेकर बेहद आशावादी आकलन पेश कर रहे हैं। यह भी इन पर उल्टा पड़ेगा।

चुनाव में मुफ्त की रेवड़ी बांटने की परंपरा बहुत पुरानी

एमके ग्लोबल की चीफ इकोनोमिस्ट माधवी अरोड़ा का कहना है कि राज्यों में होने वाले चुनाव में मुफ्त की रेवड़ी बांटने की परंपरा बहुत पुरानी है। आकलन के अनुसार पिछले दो दशकों में 20 राज्यों में जब चुनाव हुए तब उनका राजकोषीय घाटा (राज्य के सकल घरेलू उत्पादन—एसजीडीपी) के मुकाबले सामान्य से 0.5 प्रतिशत तक अधिक रहा है।

इन राज्यों में राजकोषीय घाटे की स्थिति सबसे ज्यादा

चुनावी साल में राजस्व व्यय भी 0.4 प्रतिशत देखे गए हैं। चुनावी साल में राजकोषीय घाटे की स्थिति सबसे ज्यादा छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडि़शा, झारखंड और आंध्र प्रदेश में रही है।

राज्यों की तरफ से ज्यादा कर्ज लिए जाने की संभावना

रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा स्थिति में राज्यों की तरफ से ज्यादा कर्ज लिए जाने की संभावना है। राज्यों की उधारी पहले से ही बढ़ रही है। इस साल इसमें 8-10 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। वित्त वर्ष 2025 के अंत तक राज्यों की कुल उधारी 11 लाख करोड़ रुपये रह सकता है जो पिछले वित्त वर्ष से 9 प्रतिशत अधिक होगा।

एक साल में सब्सिडी बिल में 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई

राज्यों का संयुक्त सब्सिडी बिल वर्ष 2024-25 के बजट में 3.7 लाख करोड़ रुपये रहने की बात कही गई है। यह राज्यों के कुल राजस्व संग्रह का 8.6 से 8.7 प्रतिशत है। सब्सिडी के तौर पर राज्यों की तरफ से इतनी बड़ी राशि सिर्फ कोरोना काल वर्ष 2020-21 में दी गई थी। एक साल में सब्सिडी बिल में 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसका कारण मुफ्त की रेवडि़यां हैं।

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