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वनभूलपुरा मामला: सुप्रीम कोर्ट सख्त, पुनर्वास कैंप लगाने के आदेश – 31 मार्च 2026 तक मांगी रिपोर्ट

वनभूलपुरा में रेलवे भूमि पर कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिकाओं पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में विस्तृत सुनवाई हुई। सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने पुनर्वास प्रक्रिया को पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने के निर्देश दिए।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि परियोजना से जुड़ा गतिरोध अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रह सकता। अदालत ने कहा कि प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए स्थल पर विशेष कैंप लगाए जाएं, ताकि पात्र परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत आवेदन कर सकें और उनकी पात्रता का विधिवत निर्धारण हो सके।

31 मार्च तक रिपोर्ट तलब
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से 2019 की पुनर्वास नीति के तहत अब तक उठाए गए कदमों पर 31 मार्च 2026 तक विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। अदालत ने यह भी पूछा है कि उक्त नीति के अनुसार किन-किन परिवारों को पुनर्वास का अधिकार प्राप्त होगा।

पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया अधिकांश प्रभावित परिवार आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) की श्रेणी में आ सकते हैं, लेकिन प्रत्येक परिवार की पात्रता का निर्धारण तभी होगा जब वे प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत विधिवत आवेदन प्रस्तुत करेंगे।

मौके पर लगेंगे पुनर्वास कैंप
अदालत ने निर्देश दिया कि जिला कलेक्टर, अन्य राजस्व अधिकारी तथा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण मिलकर वनभूलपुरा क्षेत्र में विशेष पुनर्वास कैंप आयोजित करें। कैंप में प्रत्येक परिवार के मुखिया को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन करने में सहायता दी जाएगी।

साथ ही राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव तथा जिला एवं उपमंडल विधिक सेवा प्राधिकरणों के सचिवों को भी कैंप के दौरान उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया है। राजस्व अधिकारियों को आवेदन प्रक्रिया में सक्रिय सहयोग देने के लिए कहा गया है।
पीठ ने यह भी कहा कि आवेदन जमा करने की प्रक्रिया 31 मार्च 2026 तक पूरी कर ली जाए तो यह सराहनीय होगा। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया गया है कि जब तक सभी पात्र परिवार आवेदन नहीं कर लेते, तब तक कैंप आयोजित किए जाते रहें।

रेलवे का पक्ष
सुनवाई के दौरान रेलवे की ओर से बताया गया कि लाइन के रियलाइन्मेंट और विस्तार परियोजना के लिए 30.65 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता है। केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि जिन संरचनाओं को ध्वस्त किया गया है, उनके प्रत्येक प्रभावित परिवार को छह माह तक 2000 रुपये प्रतिमाह देने का प्रस्ताव है।

उन्होंने यह भी कहा कि जिन परिवारों को छोटे-छोटे भूखंडों का स्वामी चिन्हित किया गया है, यदि उनकी भूमि ली जाती है तो विधिवत अधिग्रहण की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। हालांकि अतिक्रमणकारियों के संबंध में केंद्र ने स्पष्ट किया कि वे उसी भूमि पर पुनर्वास की मांग पर जोर नहीं दे सकते, क्योंकि उक्त भूमि रेलवे विस्तार परियोजना के लिए आवश्यक है।

पहले भी पूछा था मास्टर प्लान
गौरतलब है कि हल्द्वानी में रेलवे भूमि पर अवैध कब्जे को हटाने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले उत्तराखंड प्रशासन से पूछा था कि प्रभावित आबादी के पुनर्वास के लिए सरकार के पास क्या मास्टर प्लान है।

करीब 50 हजार की आबादी से जुड़े इस मामले में फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगा रखी है।
मंगलवार के आदेश के बाद स्पष्ट हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट अब पुनर्वास प्रक्रिया को प्राथमिकता देते हुए पात्र परिवारों को योजनाओं का लाभ दिलाने और परियोजना से जुड़े गतिरोध को समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आने वाली सुनवाई में राज्य सरकार की रिपोर्ट और कैंपों की प्रगति पर अदालत की नजर रहेगी।

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