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उत्तराखंड की राजनीति में एक युग का अंत: पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी का 91 वर्ष की आयु में निधन

देहरादून, 19 मई (2026): उत्तराखंड की राजनीति और देश के सैन्य इतिहास के एक बड़े स्तंभ, पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता मेजर जनरल (रिटायर्ड) भुवन चंद्र खंडूरी का आज देहरादून के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे और पिछले काफी समय से उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर से पूरे देश और विशेषकर उत्तराखंड में शोक की लहर दौड़ गई है।

​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और राज्य के तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए इसे देश और उत्तराखंड के लिए एक अपूरणीय क्षति बताया है।

देश की सेवा में समर्पित जीवन: सेना से सियासत तक का सफर

1 अक्टूबर 1934 को जन्मे भुवन चंद्र खंडूरी ने देश की सेवा को ही अपना सर्वस्व माना। राजनीति में कदम रखने से पहले उन्होंने भारतीय सेना में एक लंबा और शानदार कार्यकाल बिताया। वे सेना के कोर ऑफ इंजीनियर्स में मेजर जनरल के पद तक पहुंचे। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने अग्रिम मोर्चे पर देश की रक्षा की। सेना में उनके उत्कृष्ट और विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें ‘अति विशिष्ट सेवा पदक’ (AVSM) से सम्मानित किया गया था।

सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद वे सक्रिय राजनीति में आए और अपनी ईमानदारी व कड़क अनुशासन से एक अलग पहचान बनाई। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के वे बेहद करीबी और भरोसेमंद माने जाते थे। अटल जी की सरकार में उन्हें केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (स्वतंत्र प्रभार) की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

​देश को चारों कोनों से जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी ‘स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना’ (Golden Quadrilateral Project) को धरातल पर उतारने और देश में राष्ट्रीय राजमार्गों के आधुनिकीकरण का श्रेय भुवन चंद्र खंडूरी को ही जाता है। उनकी कार्यकुशलता को देखते हुए बाद में उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिया गया था।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में बेदाग और अनुशासित कार्यकाल

​वे पौड़ी गढ़वाल लोकसभा सीट से चार बार सांसद चुने गए। साल 2007 में जब उत्तराखंड में भाजपा की सरकार बनी, तो हाईकमान ने राज्य की कमान भुवन चंद्र खंडूरी को सौंपी। वे दो बार (2007 से 2009 और 2011 से 2012) उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे।

​अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने राज्य में पारदर्शिता और ईमानदारी की नई मिसाल पेश की। उनके द्वारा लाया गया कड़ा भ्रष्टाचार विरोधी लोकायुक्त बिल आज भी देश की राजनीति में सुचिता का एक बड़ा उदाहरण माना जाता है। “खंडूरी हैं जरूरी” का नारा उत्तराखंड के जन-जन की जुबान पर रहा, जो उनकी बेदाग छवि को दर्शाता था।

देश ने खोया एक सच्चा सपूत

मेजर जनरल खंडूरी के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आज उत्तराखंड ने न केवल अपना एक पूर्व मुख्यमंत्री खोया है, बल्कि देश ने एक सच्चा देशभक्त, कड़क प्रशासक और ईमानदारी की प्रतिमूर्ति को खो दिया है। उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय और सैन्य सम्मान के साथ किया जाएगा।

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