नई दिल्ली/जयपुर। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत की दिल्ली में एक मुलाकात ने मरुधरा से लेकर देश की राजधानी तक सियासी पारा गरमा दिया है। दिल्ली के 10 जनपथ पर अशोक गहलोत और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी के बीच हुई इस बैठक के बाद राजस्थान में जोरदार सियासी हलचल पैदा हो गई है।
राजनीतिक गलियारों में इस मुलाकात को बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि गहलोत की करीब साढ़े तीन साल बाद 10 जनपथ में इस तरह की औपचारिक एंट्री हुई है। हालांकि इस मुलाकात के पीछे के तात्कालिक कारण अलग बताए जा रहे हैं, लेकिन राजस्थान की राजनीति में इसके कई तरह के मायने निकाले जाने शुरू हो गए हैं। जानकार इसे भविष्य की राजनीति के नए संकेत के रूप में देख रहे हैं।
2022 के सियासी संकट के बाद पहली बड़ी मुलाकात
आपको याद दिला दें कि सितंबर 2022 में राजस्थान में कांग्रेस के भीतर बड़ा सियासी संकट खड़ा हुआ था, जब गहलोत गुट के विधायकों ने आलाकमान के पर्यवेक्षकों की बैठक का बहिष्कार कर दिया था। उस घटनाक्रम के बाद से ही गांधी परिवार और गहलोत के बीच एक दूरी की चर्चाएं लगातार चलती रहती थीं। लेकिन अब साढ़े तीन साल बाद 10 जनपथ के दरवाजे गहलोत के लिए खुलना यह साफ संकेत देता है कि आलाकमान और ‘जादूगर’ के बीच की बर्फ पूरी तरह पिघल चुकी है।
मुलाकात के 3 बड़े सियासी मायने और समीकरण:
पायलट बनाम गहलोत गुट में नया मोड़:
राजस्थान विधानसभा चुनाव में हार के बाद से ही प्रदेश कांग्रेस में नए नेतृत्व को लेकर कयासबाजी चल रही थी। सचिन पायलट गुट जहां खुद को फ्रंट पर देख रहा था, वहीं इस मुलाकात ने गहलोत समर्थकों को नया उत्साह दे दिया है। गहलोत की आलाकमान तक दोबारा मजबूत पहुंच से राज्य का ‘पावर बैलेंस’ प्रभावित हो सकता है।
दिल्ली की राजनीति में मिल सकती है बड़ी भूमिका:
चर्चाएं यह भी हैं कि अशोक गहलोत के लंबे संगठनात्मक अनुभव का लाभ उठाने के लिए कांग्रेस आलाकमान उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ी जिम्मेदारी सौंप सकता है। उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) में महासचिव या किसी महत्वपूर्ण राज्य का चुनाव प्रभारी बनाया जा सकता है।
पार्टी के भीतर बढ़ा गहलोत का कद:
हाल ही में गहलोत ने अपने एक बयान में कहा था कि वे “सबसे संतुष्ट राजनीतिज्ञ” हैं। इस मुलाकात के बाद यह संदेश साफ गया है कि भले ही वह इस समय राजस्थान के मुख्यमंत्री न हों, लेकिन कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के लिए उनका राजनीतिक कद और मशविरा आज भी बेहद मायने रखता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि: “राजनीति में कोई भी मुलाकात बिना वजह नहीं होती, खासकर तब जब मामला 10 जनपथ का हो। गहलोत की यह एंट्री राजस्थान कांग्रेस के कई मौजूदा समीकरणों को बना और बिगाड़ सकती है। आने वाले दिनों में संगठन के भीतर इसके बड़े असर देखने को मिल सकते हैं।”
